Wednesday, September 15, 2021
मेरी प्रतिलिपि
Monday, August 30, 2021
Saturday, July 31, 2021
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Saturday, May 22, 2021
Monday, March 29, 2021
विष्णq प्रभाकर के जीवनी साहित्य में सृजनात्मक चेतना के आयाम
भूमिका&
कोई रचनाकार किस प्रकार साहित्य का सृजन करता है] वे कौन&कौन से ?kVd हैa जिनके प्रभाव से साहित्य कृतियों का जन्म होता है तथा विष्णq प्रभाकर के साहित्य में स`जनात्मक चेतना के विविध आयाम क्या हैं तथा वे किस प्रकार मwलत:
कहानीकार होते हुए भी जीवनी साहित्य की ओर उन्मुख हुए प्रस्तुत अध्याय में इन सभी तथ्यों की चर्चा की गई है ।
काव्य मानव जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है । प्रत्येक मनुष्य इसकी रचना नहीं कर सकता । जीवन के उतार-चढ़ावों का अनुभव सभी करते हैं] प्रकृति के रम्य रूपों को भी सभी देखते हैं] हर्ष के समय उल्लास और विषाद के समय अवसाद की रेखाएं भी सर्व&साधारण के मुख पर दृष्टिगोचर होती है] किन्तु इन सब अनुभूतियों को अपने हृदय पवटल से काव्य&फलक पर यथावत् प्रतिबिंबित कर देना सभी के सामर्थ्य की बात नहीं] तब वह कौन से उपकरण हैं] जिनके बल से काव्य का निर्माण होता है \ इसी प्रकार विष्णु प्रभाकर के साहित्यिक सृजन के मूल में वे कौन से तत्व हैं जो उनकी स`जनात्मक चेतना के आयाम बने] इस पर दृष्टि डाले &
1- ऐतिहासिक दृष्टिकोण-
विष्णु जी ने जीवनियों के इतिहास का उपयोग किया तो है लेकिन कम । इस तथ्य को स्वीकारते हुए वे लिखते हैं] मैंने इतिहास का उपयोग बहुत ही कम किया है । वहीं किया है जहाँ वर्तमान के सम्बन्ध में वह कोई अर्थ रखता है । देवी श्री अहिल्याबाई होल्कर जीवनी में वे लिखते हैं] वह आज के युग में कहीं अधिक Hkzष्ट और पतित था ।
हिंसा और स्वार्थ और षडयन्त्रों के उस दावानल में वे प्रहलाद dh तरह अछुती ही नहीं रही बल्कि अपने साहस] साधना या दwरदर्शिता प्रज्ञा&वत्सलता] कार्यकqशलता और निभhZकता से इतिहासकारों को चकित कर दिया ।
इससे सोलीह वर्ष पूर्व ही फ्रांस के सोलहवें लुई ने 1778 में कहा था] **राजसत्ता पूरे तौर पर सिर्फ मेरे ही व्यक्तित्व में निवास करती है । मेरी प्रजा की मुझसे अलहदा कोई अस्तित्व नहीं है । सिर्फ मुझको ही बिना किसी का सहारा या मदद लिए कानून बनाने का पूरा अधिकार है । इसी जीवनी में वे आगे लिखते हैं&
**उधर औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप फ्रांसीसी और अंग्रेज नये बाजारों की तलाश में भारत में बड़ी मुशलता से नाना प्रकार के षडयन्त्र और कुचक्रों के द्वारा अपने&पैर जमा रहे थे । 1757 में प्लासी के मैदान में जब लार्ड क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुददौला को हरा दिया तो मानो भारत के भाग्य का निबटारा हो गया और 1764 में बक्सर की लड़ाई के बाद दिल्ली का नाममात्र का बादशाह भी उनकी शरण में आ गया । इसी जीवनी में कुछ आगे चलकर वे लिखते हैं - **कैसा समय था जब चारों ओर षडयन्त्र] कुचक्र] युद्ध] कठपुतली] मुगल सम्राट चालाक अंग्रेजी महत्वाकांक्षी मराठे] हैदर अली] टीपू] निजाम तब के रंगमंच के ये अभिनेता ऐसा नहीं कि इनमें शक्तिशाली नेता या कुशल प्रशासक नही थे परन्तु अनेक ऐसे कारण थे जो उनमें से किसी को भी एक केन्द्रीय शक्ति के रूप में नहीं उभरने दे रहे थे । सबसे बड़ा कारण था] राष्ट्रीयता की भावना का अभाव । काका कालेलकर] जीवन में उनकी इतिहासपरक दृष्टि का एक उदाहरण मिलता है] ** सन् 1924 में जल से छूटने के बाद गqजरात के राजनेताओं ने उनका सम्मान करने का निश्चय किया । उन्हें वीराद में (13 मई को ) होने वाली राजनैतिक परिषद का अध्यक्ष चुना गया ।
गाँधी जी की अनुमति से ही उन्होंने यह पद स्वीकार किया लेकिन तीन दिन परिषद की अध्यक्षता करने के अतिरिक्त यह राजनीति से अलिप्त ही रहे । ‘kghn भगत सिंह] जीवनी में प्रभाकर जी नs इतिहास का सुन्दर निर्वाह किया है] कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैA
** भगत सिंह ने अपनी मंजिल ढूँढ ली थी । कौशौर्य और जीवन का सfU/।काल भावुक आवेश का काल हSA अपनी शक्ति पर गर्व करने और बड़े&बड़े स्वप्न देखने का काल है । उन स्वप्नों को पूराने करने वाले विरले जन होते है । भगत सिंह उन्हीं विरले जनों में थे । मुकदमें का आरम्भ 7 मई 1929 को हुआ और बहुत शीघ्र ही वह *ऐतिहासिक* बन गया । उसने न केवल देश का बल्कि संसार भर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया । जनता और समाचार पत्र सभी ने सहज । भाव से उसमें रूचि ली ।
**10 जून, 1929 को उनका मुकदमा समाप्त हो गया और 12 जून को सेशन जज ने उन दोनों को अजन्म कारावास का दण्ड सुना दिया । भगत सिंह मियाँवाली और दत्त लाहौर सैण्ट्रल जेल में भेज दिये गये ।
**सरदार बल्लभ भाई पटेल जीवनी में ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं] ** सन् 1928 में जो साइमन कमीशन भारत आया था और जिसका समग्र भारत ने बहिष्कार किया था उसी की सिफारिशों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने भारत को फैडरल राज्य &शासन देने का ध्यये स्वीकार किया आSर लन्दन में सभी दलों की गोलमेज कांफ्रेंस बुलाने की घोषणा की ।**
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय जीवनी में वे लिखते है] **शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के जन्म से कुछ पहले अंग्रेजों का राज खूब जम गया था । तुमने 1857 के विद्रोह dh dgkuh
lquh gksxh । उस समय पहले&पहल सारे देशवासियों को पता कि रास्ता क्या है । तब दsश भर में आजादी की आग सुलग उठी थी ।
2- यथार्थवादी
दृष्टिकोण
विष्णु जी का दृष्टिकोण न केवल राजनीतिक] सामाजिक अपितु ;FkkFkZoknh भी है । रचनाकार अपनी रचनाओं में अपने परिवेशगत अनुभूति की अभिव्यक्ति djrk है । उसका परिवेश काल्पनिक न होकर यथार्थ होता है । जीवनी में तो कल्पना कम से कम प्रयोग होता है । यथार्थ की अभिव्यक्ति के बिना कोरी कल्पना पर आधारित साहित्य मानव भावनाओं के अनुकूल तथा स्वाभाविक होगा ऐसी सम्भावना बहुत कम होती है । साहित्यकार की रचनाओं का विषय मनुष्य अवश्य होता है और मनुष्य का प्रभावशाली चित्रण यथार्थ के आधार पर ही सम्भव है । समाज में अच्छा या बुरा जो कुछ भी है उसे उसी रूप में साहित्यकार प्रस्तुत करता है वस्तुतः यही यथार्थ है । शिवदान सिंह चौहान का मानना है कि **हिन्दी साहित्य को बड़ी&बड़ी परम्पराओं ने जीवन&सत्य की सदा अभिव्यक्ति की है] यह दूसरी बात है कि वह सत्यक भी मनुष्य मात्र के व्यापक जीवन की एकता का हो या राजदरबारों के सकुचित वातावरण का] या व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक विसंगतियों का या भावी जीवन कs लिए संघर्षरत शोषित मानवता का ।**
विष्णु प्रभाकर जी का संघर्षमय जीवन भारतीय राजनीति का संघर्षकाल रहा है । अपनी प्रारंभिक रचनाओं में विष्णु जी ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम से ysdj भारत के विभाजन तथा देशव्यापी साम्प्रदायिक दंगों का यथार्थ प्रधान चित्रण किया है । विष्णु जी के सम्पwर्ण साहित्य में यथार्थ की प्रधानता है] स्वाधीनता संग्राम vlgयोग आन्दोलन] सत्याग्रह भारत का विभाजन] साम्प्रदायिक दंगों तथा कश्मीर सs सम्बन्धित विष्णु जी का साहित्य यथार्थ पर ही आधारित है ।
वैसे विष्णु ;ह
मानते
हैं
कि
उन्होंने
परिवर्तन
को
सदैव
स्वीकार
किया
है
लेकिन
वे
किसी में
कभी
बंधे
नहीं
।
यथार्थ
को
स्वीकारते
हुए
वे
कहते
हैं
& **eSa यथार्थ
को
Lवीकार
करता
हूँ
।
समाज
सापेक्ष
होकर
उससे
बचा
नहीं
जा
सकता ।** विष्णु
जी
का
जीवनी
साहित्य
समृद्ध
है
जिसमें
मनोविज्ञान
का
प्राधान्य
होने
के
साथ
ही
साथ
गधार्थ
का
भी
बाहुल्य
है]
परिवेश
और
उसे
संबंधित
यथार्थ
को
विष्णु
जी
स्वीकार करते
रहे
हैं
लेकिन
किसी
व्यवस्था
से
बंधना
उन्हें
स्वीकार
नहीं
है
।
जीवनियों
में
यथार्थ
का
सर्वाधिक
महत्व
है]
जिसका
निर्वाह
उनकी
जीवनियों
में
बखूबी
हुआ
है ।
यथार्थ
&परिचय
स्पष्टवादी
भी
है
।
जिनके
कुछ
उदाहरण
उनकी
जीवनियों
से
लिए
गए
हैं
।
रवीन्द्रनाथ
ठाकुर
की
जीवनी
में
वे
लिखते
हैं
कि&
**इस
तरह
के
अभाव
से
मुझे
कोई
तकलीफ
नहीं
होती
थी
लेकिन
जब
हमारा
दर्जी
इनायत
खाँ
कुरते
में
जेब
लगाना
भी
ठीक
नहीं
समझता
था
तब
दुःख
जरूर
होता
।
वही
विष्णु
जी
ने
अभवग्रस्त
जीवन
का
वर्णन
कुछ
इस
प्रकार
किया
है]
**कौन&सा
जवाब
देता
कि
कुछ
नहीं
चाहिए
।
उसके
बाद
वह
कोई
आग्रह
न
करता
।
इस
तरह
थोड़ा
खाना
मुझे
बचपन
से
ही
बड़े
मजे
में
चलने
लगा
।
जलपान
में
कभी
पाव
रोटी
और
केले
के
पत्ते
में
लिपटा
हुआ
मक्खन
नसीब
हुआ
तो
ऐसा
लगा
मानो
आकाश
हाथ
में
आ
गया ।
कमालपाशा जीवनी में वे लिखते हैं& **आज
टर्की
की
नारियाँ
घर
की
चारदीवारी
में
बन्दी
नहीं
हैं
।
वे
मास्टर]
वकील]
डाक्टर
ओर
जज
हैं ।
पुलिस
में
भी उनका प्रवेश है । टाइप और शार्टहैण्ड तो स्त्रियों की बपौती है । सन् 1937 में ऐसा कानून पास किया गया जिसके द्वारा फौज में भर्ती होने के लिए स्त्री&पुरूष में कोई भsद
नहीं
माना
गया
।
यह
समता
की
सीमा
है
।
काका कालेलकर की जीवनी मे & **वे कहते हैं हम कितने वर्ष जीयेंगे] सो काsbZ नहीं जानता । मृत्यु के बाद फिर से नया जन्म लेने तक कितना समय अज्ञात va/ksjs में
रहेंगे]
सो
भी
हम
नहीं
जानते
।
मृत्यु होने के बाद और नव जन्म प्राप्त gksus के पहले क्या हमारा जीवन शून्य रूप ही होता है \
भगत सिंह की जीवनी में उनके अनुसार] **चालीस
घण्टे
की
वह
यात्रा]
izfr{k.k संकट
से
साक्षात्कार]
प्रतिक्षण
सहज
होने
का
अभिनय]
पति
और
पिता
होने का
अहसास]
किसी
दूसरे
की
पत्नी
बन
जाने
का
रोमांस
वह
सब
अनुभव
करने
की
बात
है]
कल्पना
करने
की
नहीं
।
हिंसा
व
अहिंसा
में
अंतर
स्पष्ट
करते
हुए
वे
कहते gSa
& **हमने
ऊपर
कल्पना
विलासी
¼स्वप्निल½
अहिंसा
शब्द
का
प्रयोग
किया
है ।
हम
उसकी
व्याख्या
करना
चाहते
हैं
।
हमारी
दृष्टि
में
बल
प्रयोग
उस
समय
अन्यायपूर्ण होता
है]
जब
वह
आक्रामक
रीति
से
किया
जाए
और
यह
हमारी
दृष्टि
में
हिंसा
है
।
परन्तq
जब
शक्ति
का
उपयोग
किसी
विशिष्ट
उद्देश्य
की
पूर्ति
के
लिए
किया
जाए ।
तो
वह
नैतिक
दृष्टि
से
न्यायसंगत
हो
जाता
है
।**
क्रांति की परिभाषा बताते हुए विष्णु जी कहते हैं कि& **क्रांति
में
रक्तपात का अनिवार्य स्थान नहीं है] न उसमें व्यक्तिगत रूप से प्रतिशोध लेने की ही गुंजाइश
है
।
क्रांति
बम
और
पिस्तौल
की
संस्कृति
नहीं
है ।
क्रांति
से
हमारा
मतलब
यह
है
कि
अन्याय
पर
आधारित
वर्तमान
व्यवस्था
में
परिवर्तन
होना
चाहिए ।
उत्पादक
अथवा
श्रमिक
समाज
के
अत्यन्त
आवश्यक
तत्व
हैं
।**
शरतचंद्र जी की जीवनी में वे कहते हैं कि] **संसार
का
काम
सपने
देखकर हाs सकता] यहाँ तो इस धरती पर चलना पड़ता है] इस धरती का काम करना iM+rk
gSA ** उनकी समाजवादी दृष्टि का यथार्थवाद से संबंध स्थापित होता है] जब os dgrs
gSa& **पुरूष एक काम करता तो पानी नहीं माना जाता लेकिन अगर नारी सा काम को करे तो वह पापिन कहलाती है ।**
सरदार बल्लभ भाई पटेल की जीवनी में यथार्थवादी भाषण देते हैं] **सारे xqtरातियों
को
मैं
यहाँ
से
सुनाना
चाहता
हूँ
कि
जिन्हें
मृत्यु
का
भय
लगता
हो
वे
rhर्थयात्रा
करने
निकल
जायें
।
वे
अपनी
जायदाद
की
व्यवस्था
करके
चले
जायें
जिनके
पास
पैसे
हों
वे
विदेशों
में
चले
जायें
।
यदि
आप
सच्चे
गुजराती
हैं]
तो
ऐसा कोई
काम
न
करें
जो
लज्जित
करने
वाला
हो
।
सिर
नीचा
करके
कभी
न
घwमें
। दरवाजे
बन्द
करके
घर
में
न
घुसे
रहें
।
थोड़े
ही
दिन
बाकी
हैं]
पन्द्रह
वर्ष
से
हमें जो
तालीम
और
शिक्षा
मिली
है
उसकी
अब
परीक्षा
होने
वाली
है ।**
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की जीवनी में वे लिखते हैं कि& **स्वामी
दयानन्द
की
मातृभाषा
हिन्दी
नहीं
थी
पर
उनके
नेतृत्व
में
और
इनकी
प्रेरणा
से
हिन्दी
के
प्रचार&प्रसार
के
लिए
आर्य&समाज
और
गुरूकुल
कॉगड़ी
ने
जो
कुछ
किया]
उसकी
प्रशंसा
सभी
ने
की
है ।**
3 गाँधी
दृष्टिकोण
जिस युग में विष्णु जी ने लेखन प्रारम्भ किया और लेखन की परिपक्व अवस्था में पहुँचे उस सम्पूर्ण यात्रा में विष्णु जी का घनिष्ट सम्पर्क गां/khवादी विचाराधारा से हआ । गाँधी भारतीय राजनीति में अपना स्थान बना चुके थे और
उन
दिनों
अभी
विष्णु
जी
का
विद्यार्थी
जीवन
ही
था
।
कथा
साहित्य
में
प्रेमचन्द
युग
से
और
कविता
में
छायावाद
युग
से
गांधीवाद
का
उदय
स्वीकार
किया जाता
है ।
विष्णु
जी
का
लेखन
प्रेमचन्द
युग
के
अंत
से
ही
प्रारम्भ
होता
है ।
प्रेमचन्द
युगीन
राजनीति
की
भांति
साहित्य
में
भी
क्रांतिकारी
मोड़
आया
।
इस
युग
साहित्य की
दृष्टि
से
भी
उपलब्धि
का
युग
कहा
जा
सकता
है
।
इस युग का प्रायः प्रत्येक साहित्यकार गांधीवाद से प्रभावित है । यहां यह भी स्मरणीय है] मुख्य रूप से गांधी के संबंध में कि *गाँधी युग का प्रभाव* vkSj *गाधीवादी
के
प्रभाव*
दोनों
में
स्पष्ट
अंतर
है]
क्योंकि
युगीन
उतार&चढ़ावों
से izHkkवित
होकर
साहित्य
रचना
करना
अथवा
किसी
महत्वपूर्ण
व्यक्ति
से
प्रभावित
हो lkfgR;
l`tu djuk करना
दोनों
में
पर्याप्त
अंतर
है ।
स्पष्ट
है
कि
राजनीति
ने
गाँधी
को अपना एकमात्र नता स्वीकारा जबकि साहित्य में ऐसा नहीं हआ ।
गाँधी
का
जीवन
दर्शन
क्या
था
\ वह
कौन
से
आदर्श
थे]
जिनसे
प्रभावित
होकर
विश्वमानव
के
अंतर
में
गाँधी
छा
गए
और
अमर
हो
गए
\ इन्हें
जानने
से
गाँधी
दर्शन
की
महत्ता
स्वंय
सिद्ध
हो
जाती
है ।
जीवन
पर्यन्त
गाँधी
मानवता]
सत्य
और
अहिंसा
के
पोषण
में
लगे
रहे]
उनका
स्वयं
का
अंत
भले
ही
हिंसा
से
हुआ
हो]
यह
भी
कम
आश्चर्यजनक
नहीं
।
सहृदय
ऐसी
कल्पना
करने
लगे
तो
पैरों
तले
जमीन
खिसक
जाती
है ।
आज
भले
ही
स्वार्थी
मानव
संसार
गाँधी
को
भुला
दे]
लेकिन
उनकी
मृत्यु
के
उस
हृदय
विदारक
संस्मरण
को
भुलाये
नहीं
भुलाया
जा
सकता
जब
देश
का
आबालवृद्ध
उनकी
मृत्यु
का
समाचार
सुनकर
हतप्रभ
हो
गया
था]
रसोई
घर
खुले
रह
गये
थे]
बच्चे
तक
आने
का
नाम
नहीं
लेते
थे]
सर्वत्र
अश्रुप्रवाह
उमड़ते
दिखता
था
।
मनुष्य
द्वारा
मनुष्य
की
हत्या
के
इस
समाचार
को
सुनकर
ऐसा
लगता
था&
विष्णु
प्रभाकर
के
शब्दों
में]
**जैसे
शेषनाग
ने
पृथ्वी
को
पटक
दिया]
जैसे
सागर
मर्यादा
को
छोड़कर
उमड़
पड़े]
जैसे
विश्व
के
समस्त
ज्वालामुखी
एक
साथ
भभक
उठे]
जैसे
उनचास
पवन
एक
साथ
इन्द्र
के
बंधन
से
मुक्त
हो
गए+++++++++++++++++++++++++++
किसी
को
कुछ
नहीं
सूझा
।**
सम्पूर्ण
देश
ने
ऐसा
अनुभव
क्यों
किया \
गाँधी की व्यापक विचारधारा को गांधीवाद नाम दिया गया है] लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं चाहा कि उनकी विचारधारा को किसी *वाद* का नाम दिया जाए । गाँधी तो व्यावहारिकता पर विश्वास करते थे] प्रचार&प्रसार
पर
नहीं
।
मानव
कल्याण
उनका
लक्ष्य
था ।
अंत
तक
गाँधी
अपने
लक्ष्य
से
भटके
नहीं
गाँधी
के
जीवन
का
लक्ष्य
भारत
में
रामराज्य
की
स्थापना
करना
था
।
इस
उद्देश्य
की
पूर्ति
कs
लिए
उन्होंने
प्रथम
कदम
देश
की
स्वाधीनता
के
रूप
में
उठाया
।
देश की Loतंत्रता के लिए गाँधी द्वारा किया गया संघर्ष] उनकी देन सत्याग्रह] असहयोग vkanksyu इत्यादि इतिहास में अमिट हो चुके हैं । नोआखाली] डांडीयात्रा तथा नमक आंदोलन]
स्वदेशी
इत्यादि
से
संबंधित
संस्मरणों
को
लेकर
तो
भारतीय
भाषाओं
के
साहित्यम
बहुत
कुछ
कहा
जा
चुका
है ।
यह
सब
गाँधी
के
व्यक्तित्व
का
परिणाम
हैA**
1919 ई0 में विष्णु जी के चाचा इन्हें कांग्रेस की सभा में ले गये जिसमें पाँच वर्ष के बालक ने भाषण दिया था तथा सभी से खद्दर पहनने की प्रार्थना की थी] उस बालक का इस बालक के मन पर यह प्रभाव पड़ा कि वह भी खादी को एक विश्वास की तरह पहनने लगे । उन्हीं के शब्दों में------**कुछ और घटनाएं हैं जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता । 1919 के वे दिन मुझे कल की तरह स्मरण हैं] जब मेरा मन खिलाफत और कांग्रेस के नारों में रमा रहता था। खूब याद है कांग्रेस की एक सभा में पाँच वर्ष के एक बालक ने भाषण दिया था । खद्दर का कुर्ता धोती पहने उस बच्चे ने अपनी प्यारी भाषा में कहा था] **मैं छोटा सा बालक हूँ] खद्दर पहनता हूँ] आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि आप खद्दर पहनें । सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी और मेरे चाचा ने मेरी ओर देखकर कहा] *दsख बे] एक यह लौंडा है] कैसे बोले है और एक तू है । - तब मैं सकपका गया था पर यह भी सत्य है कि उस क्षण ने ही मेरे जीवन को पलट दिया । मेरे बालक मन ने निश्चय किया कि मैं खद्दर पहनूंगा ।**
विष्णु प्रभाकर का जन्म जैसा कि उल्लेख किया गया है] उस काल हुआ जब गाँधी ने भारतीय राजनीति में सर्वमान्य नेता के रूप में प्रवेश किया । जब से विष्णु जी ने होश संभाला तब से लेकर वे गाँधी को कभी अपनी आंखों कभी संचार माध्यमों के जरिये देखते और सुनते रहे । गाँधी की मृत्यु के le; विष्णq
जी
स्वयं
दिल्ली
में
थे
ही
।
**मृत्यु
के
समय
के
करूण&दृश्य
का mYysख
भी
विष्णु
जी
ने
अपनी
लेखनी
से
*जाने&अनजाने]
रेखाचित्र
संग्रह
में
किया है**
*कान्त*
को
सम्भवतः
विष्णु
जी
ने
अपने
ही
रूप
में
प्रस्तुत
किया
है ।
गाँधी
जी
के ;qx में
जीने
वाले
विष्णु
जी
के
लिए
यह
असंभव
नहीं
कि
वे
गाँधी
के
क`त्यों
एवं विचारधारा
से
प्रभावित
न
होते
।
देश
की
आजादी
के
लिए
जो
भी
कछ
गाँधी
ने
किया
उसका
प्रभाव
विष्णु
जी
और
उनकी
रचनाओं
में
स्पष्ट
परिलक्षित
होता
है ।
युग
की
मांग
को
पूरा
करने
में
लेखक
अथवा
कवि
तभी
सफल
हो
सकता
है]
जब
वह
जनरूचि
का
बारीकी
से
निरीक्षण
करे ।
गाँधी
भारतीय
जनजीवन
में
इतने
लोकप्रिय
हो
चुके
थे
।
देश
का
प्रत्येक
नागरिक
उनकी
विचारधारा
को
जानने
की
आवश्यकतास्वतः
महसूस
करने
लगा
था
।
इस
दशा
में
कवि
लेखकों
के
लिए
यह
आवश्यक
था
कि
वे
गाँधी
के
सत्य]
अहिंसा]
प्रेम]
सत्याग्रह
तथा
असहयोग
आन्दोलन
संबंधी
विचारों
को
लेकर
कुछ
लिखें
।
गाँधी
के
जीवन
से
संबंधित
अविस्मरणीय
घटनाओं
एवं
घटना
स्थलों
को
लेकर
भी
बहुत
कुछ
कहा
गया
है ।
ऐसे
स्थल
और
घटनायें
हैं&
डांडीयात्रा]
नोआखाली]
जालियाँवाला
बाग]
साम्प्रदायिक
दंगे]
दो
का
विभाजन
इत्यादिA
निष्कर्ष
काव्य
मानव&जीवन
की
सर्वोत्तम
उपलब्धि
है ।
प्रत्येक
मनुष्य
इसकी
रचना
नहीं
कर
सकता
।
जीवन
के
उतार&चढ़ावों
का
अनुभव
सभी
करते
हैं]
प्रकृति
के
रम्य
रूपों
को
भी
सभी
देखते
हैं]
हर्ष
के
समय
उल्लास
और
विषाद
के
समय
अवसाद
की
रेखाएं
भी
सर्व&साधारण
के
मुख
पर
दृष्टिगोचर
होती
है]
किन्तु
इन
सब
अनुभूतियों
को
अपने
हृदय&पटल
से
काव्य&फलक
पर
यथावत
प्रतिबिंबित
कर
देना
सभा
के
सामर्थ्य
की
बात
नहीं]
तब
यह
जानना
आवयक
हो
जाता
है
कि
वे
कौन
से
उपकरण
हैं
जिससे
विष्णु प्रभाकर के
मूल
में
उस
बीज
का
प्रस्फुटन
हुआ ।
विष्णु प्रभाकर के
साहित्यिक
स`जन
के
मूल
में
वे
कौन
से
तत्व
हैं
जो
उनकी
सृजनात्मक
चsतना
के
आयाम
बने
। चsतन मन की प्रमुख विशेषता चेतना है अर्थात् वस्तुओं] विषयों तथा व्यवहारों का ज्ञान] चेतना का ज्ञान कहलाता है । चेतना का वर्णन तो किया जा सकता है ijUrq इसकी परिभाषा कठिन है । चेतना की प्रमुख विशेषताएं हैं& निरन्तर परिवर्तनशील vFkवा
*प्रवाह*
।
यह
गुण
विष्णु
प्रभाकर
जी
में
कूट&कूट
कर
भरा
हुआ
है]
उन्होंने
भी
कार्य
किया
उसे
पूरा
किया
चाहे
उसमें
कितना
समय
लग
जाये
क्योंकि चेतना से
ही
रचना
बनती
है
व
निकलती
है ।
विभिन्न
विषयों
की
अलग&अलग
le; पर
चेतना
होने
पर
हम
सब
भी
यह
अनुभव
करते
हैं
कि
वह
अमुक
वस्तु
देखी
gSA mसी
अनqभव
को
लेखनी
में
उतार
लिया
जाये
तो
रचना
कहलाती
है ।
विष्णु
जी की
रचनात्मक
भावना
बचपन
से
ही
जाग
उठी
क्योंकि
वे
नैसर्गिक
प्रतिभा
के
व्यक्ति
है
उन्होंने
बचपन
में
ही
लिखना
प्रारम्भ
कर
दिया
था ।
जब
वे
आठवीं
कक्षा
में
पढ़ते थे
तो
उनका
एक
लेख
छपा
था
*बाल
सखा
के
नाम*
।
इससे
यह
सिद्ध
होता
है
कि
बचपन
से
ही
उनमें
साहित्यकार
के
गुण
दिखाई
देने
लगे
थे ।
चेतना
शब्द
का
उपयोग
प्रायः
उपयुक्त
मनोविज्ञान
अर्थ
ये
ही
होता
है
या
कभी&कभी
इसका
प्रयोग
दार्शनिक
अर्थ
में
भी
हो
सकता
है ।
विज्ञानवादी
और
प्रत्ययवादी
दर्शनिक
चेतना
या
विज्ञान
को
शाश्वत
और
एक
मात्र
सतह
मानते
हैं
इस
अर्थ
मे
चेतना
शब्द
*आत्मा*
का
समानार्थक
हो
जाता
है ।
परन्तु
साहित्य
और
दर्शन
में
भी
इस
अर्थ
से
प्रायः
*चैतन्य*
शब्द
का
उपयोग
किया
जाता
है ।
चेतना
शब्द
मनोविज्ञान
अर्थ
में
ही
अधिक आता
है ।
रचनाकार के लिये कि जिज्ञासु होना अनिवार्य है यदि जिज्ञासु नहीं होगा तो इसके मन में कोई चेतना नहीं जागेगी । विष्णु जी में ये दोनों गुण विद्यमान हैं । उनकी रचनायें सन् 1934 से प्रकाशित होने लगी थी तथा 14 वर्ष रंगून तथा कलकत्ता आदि स्थानों में भ्रमण करके *आवारा मसीहा* लिखी । इससे सिद्ध होता हS कि विष्णु जी घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति थें साहित्यकार हमेशा परिवर्तनशील होता है । वह परिवेश से प्राप्त संवेदना] शिष्ट अनुभूतियों को ज्यों की त्यों प्रस्तुत कर उसमें परिवर्तन भी कर सकता है ।
विष्णु जी लिखते हैं *परिवेश* से प्रभावित होकर भी मेरे सृजक का स्वर euq”य की
पहचान
और
हर
प्रकार
के
शोषण
से
मुक्त
है ।
उस
समय
देश
में
अंग्रेजों
राज्य
था
और
देश
को
आजाद
करवाने
के
लिये
कई
आंदोलन
चलाये
जा
रहे
।
राजनीतिक
परिस्थितियों
में
भी
काफी
उतार&चढ़ाव
आ
रहे
थे ।
विष्णु
जी
के साहित्य
में
राजनीतिक
घटनाएं
बहुत
महत्वपूर्ण
सिद्ध
हुई
।
वे
गांधीवादी
विचारधारा ds Fks
क्योंकि
उस
समय
गाँधी
भारतीय
राजनीति
में
अपना
स्थान
बना
चुके
थे
।
वे
खादी
के
कपड़े
तथा
टोपी
पहनते
थे
जैसा
कि
विदित
है
।
गांधी
जी
की
व्यापक
विचारधारा
को
गाँधी
वाद
का
नाम
दिया
गया
है
।
लेकिन
विष्णु
जी
ने
यह
कभी
नहीं
चाहा
कि
उनकी
विचारधारा
को
कोई
*वाद*
का
नाम
दिया
जाये ।
वे
हमेशा
व्यावसायिकता
पर
विश्वास
करते
थे ।
विष्णु जी धर्मपरायण व्यक्ति थे तथा उनकी सामाजिक] धार्मिक] राष्ट्रवादी दृष्टि लगभग उनकी सभी जीवनियों में दिखाई देती है । और उन्होंने पने साहित्य के माध्यम से देशभक्ति और साम्प्रदायिक एकता को जगाये रखा ।
मुख्यतः विष्णु प्रभाकर जी तीन पूर्ववर्ती साहित्यकारों शरतचन्द्र] प्रेमचन्द और प्रसाद से बहत अधिक प्रभावित हुए हैं । विष्णु जी के साहित्य में मनोविज्ञान का सर्वाधिक प्रयोग झलकता है । इनकी बहुचर्चित एकांकी *ममता का विष* तथा *भावना और संस्कार* है ।
उस समय लोग अंधविश्वास को मानते थे । बाल&हत्या,
नरबलि
आदि
को
राsका
गया
तथा
आर्य
समाज
की
स्थापना
की
गई
।
विष्णु
जी
आर्य
समाज
से
जुड़
गये
और
उनकी
जीवनियों
में
सामाजिक]
धार्मिक
एवं
राष्ट्रवादी
दृष्टिकोण
स्पष्ट
दिखाई
देता
है
।
यqगीन
परिस्थितियों
के
अनुरूप
साहित्यिक
परिस्थितियों
में
भी
एक
ubZ क्रांति
का
जन्म
हुआ
।
उपन्यास]
कहानी]
नाटक]
एकांकी]
आलोचना]
निबंध
आदि
इस
आधुनिक
युग
की
उपज
हैं
।
